Sunday, 19 March 2017

Chandigarh - The City Beautiful



मनाली यात्रा के दौरान चूंकि हमने चंडीगढ़ को ही बेस बनाया था इसलिए हमारे पास मनाली जाते समय एक दिन और मनाली से लौटते समय एक दिन चंडीगढ़ घूमने का मौका था।  यूँ तो चंडीगढ़ की खूबसूरती को निहारने के लिए एक दिन का समय पर्याप्त है किन्तु इस शहर के अलग अलग मिजाज को देखने और परखने का मज़ा भी कुछ और है। संयोगवश हमें मौसम की विभिन्न छटाओं में इस शहर के सुन्दर पर्यटन स्थलों के भ्रमण का अवसर मिला। प्रख्यात फ्रेंच आर्किटेक्ट ले कॉर्बुसियर द्वारा योजनाबद्ध तरीके से बसाया गया यह शहर भारत के शहरी प्लानिंग के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है।

चंडीगढ़ पहुँचने के घंटे भर के अंदर ही हमलोग मशहूर रॉक गार्डन की और चल पड़े थे क्योंकि शाम घिर आयी थी और गार्डन में प्रवेश का समय समाप्त न हो जाये , यह चिंता हो रही थी। शहर से लगभग ३ किमी दूर होने की वजह से हमलोग जल्द ही गार्डन पहुँच गए और एंट्री टिकट लेकर अंदर प्रवेश कर गए। अंदर प्रवेश करने पर ये पता चला कि किन्हीं नेकचंद जी के अथक प्रयासों से यह 1957 में अस्तित्व में आया और वर्तमान में चंडीगढ़ शहर की पहचान बन चुका है।

रॉक गार्डन, चंडीगढ़ 

रॉक गार्डन में प्रवेश करते ही पत्थरों एवं अन्य धातुओं से बनी कलाकृतियाँ मन मोह लेती हैं। कई कलाकृतियों में अपशिष्ट पदार्थों (waste materials) का भी उपयोग किया गया है। गार्डन के अंदर के रास्ते भी किसी भूल-भूलैया से कम नहीं हैं। ऐसे में अन्य पर्यटकों की आवाज़ से आप आगे के रास्ते का अनुमान लगा सकते हैं। तंग गलियों से आगे बढ़ते हुए सहसा हमारी नजर इस झरने पर गयी और साथ ही दिखे झरने के पास खड़े कई सारे टूरिस्ट। कुछ देर तो झरने की कल-कल करती आवाज़ के सानिध्य में समय बिताना लाजिमी था और हम भी बढ़ लिए पानी के समीप बाल-सुलभ उत्सुकता लिए - कपड़ों के भींगने के डर से परे।

कुछ वक़्त झरने के पास 


रॉक गार्डन में करीब घंटे भर घूमने के बाद हमलोग गार्डन से एक-डेढ़ किमी दूर सुखना लेक चले गए, हालाँकि शाम घिर आयी थी फिर भी झील किनारे बैठ मंद-मंद हवा का आनंद उठाना भला किसे अच्छा नहीं लगता। तीन वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली यह विशालकाय झील चंडीगढ़ के प्रमुख पर्यटन आकर्षणों में  एक है जहाँ न सिर्फ पर्यटक, बल्कि स्थानीय लोग, बच्चे, औरतें एवं फिटनेस के शौक़ीन युवा भी बड़ी संख्या में आते हैं। झील से सूर्योदय का दृश्य भी काफी शानदार होता है ऐसा हमें वहां पहुँचने पर पता चला। हमने अगली सुबह फिर से झील आने का निश्चय किया ताकि सूर्योदय के नज़ारे को देखा जा सके। वैसे शाम का नजारा भी कुछ कम मनमोहक नहीं था और चहल पहल भी काफी थी। कई लोग झील में बोटिंग करते दिखाई पड़ रहे थे और माहौल कुछ उत्सव जैसा बना हुआ था। कुछ देर झील किनारे बने बांध पर बैठने के बाद हमलोग अपने गेस्ट हाउस की ओर चल दिए। 

सुखना झील
अभी हमलोग झील से सड़क की तरफ कुछ ही दूर गए थे कि एक सुखद आश्चर्य हमारा इंतज़ार कर रहा था और वो था आसमान में पंख फैलाये इंद्रधनुष। अपनी किस्मत को धन्यवाद देते हुए मैं इस सतरंगी छटा को अपने कैमरे मैं कैद करने में जुट गया।
इंद्रधनुष 
अगली सुबह हमें मनाली के लिए भी निकलना था पर हमने सुखना झील और रोज गार्डन के लये थोड़ा वक़्त निकाल लिया था और हमलोगों ने अपने ड्राइवर जो कि हमारे आगे के पूरे ट्रिप के दौरान हमारे साथ रहने वाले थे, उन्हें भी झील और रोज गार्डन होते हुए मनाली चलने के बारे में बता दिया था। 

तड़के सुबह हमलोग अपने सामान के साथ झील की तरफ चल पड़े और सूरज की लालिमा हमारा स्वागत कर रही थी। प्रातः काल की लालिमा से ओत-प्रोत झील और झील में तैरते हंसों के समूह को देखना बहुत ही खुशनुमा एहसास था। समय का बिल्कुल भी पता नहीं चला की कब सूरज की रक्तिम किरणें सुनहली हो चलीं थीं और झील के आस-पास लोगों की आवा-जाही भी बढ़ गयी थी। 
                                               सुखना झील से सूर्योदय का दृश्य                                                   इमेज सौजन्य : chandigarhmetro.com

हमलोग झील के किनारे बने बाँध पे चल रहे थे और हमारा ध्यान इस पुराने और जर्जर टावर ने आकर्षित किया। टावर तक जाने का रास्ता अब बंद हो चुका है, हालाँकि हमें लोगों से बात-चीत से यह पता चला कि इस टावर पे चढ़ कर कई लोग आत्महत्या का प्रयास कर चुके हैं और इसलिए स्थानीय लोग इसे सुसाइड टावर के नाम से भी जानते हैं। 
सुसाइड टावर 
अब समय हो चला था की हम रोज गार्डन को देखते हुए मनाली के सफर की शुरुआत करें क्यूंकि 8 -9 घंटे का सफर अँधेरा होने के पहले पूरा किया जा सके। झील के पास स्थित कैफेटेरिया में हमलोगों ने नाश्ता किया और रोज गार्डन की एक झलक पाने के लिए निकल पड़े। 
झील के पास स्थित कैफेटेरिया 
रोज गार्डन में बहुत ज्यादा समय बिताने का मौका नहीं मिल पाया और थोड़ी देर वहां रुक कर हम अपने गंतव्य की तरफ कूच कर गए। 
रोज गार्डन, चंडीगढ़ 
चंडीगढ़ से मनाली तक का सफर भी कम मनोरंजक नहीं था , पर उसके बारे में विस्तार से अगले अंक में....  तब तक के लिए अलविदा। ..... 




Saturday, 12 November 2016

Exploring Himachal - Manali ki Manoram Sair - Part I



अरसे बाद भ्रमण का अवसर मिला इस बार मई के महीने में और बैंक के आखिरी तिमाही  की टारगेट और अचीवमेंट के उठापटक के बाद इससे अच्छा मौका शायद नहीं मिल सकता था दिलोदिमाग को तरोताजा करने के लिए। दूसरी तरफ पटना में मई की प्रचंड गर्मी भी शरीर को झुलसा देने के जतन में जुट गयी थी। ऐसे में पहाड़ों की ओर रुख करने के अलावा अन्य कोई भी विचार मन को नहीं सूझा और इस तरह मैंने और श्रीमती जी ने हिमालय की हसीं वादियों का लुत्फ़ उठाने का प्लान बनाया। अरुणाचल को छोड़कर पूर्वी हिमालय में बसे सारे पर्वतीय रमणीक स्थलों पर समय बिताने का अवसर मुझे प्राप्त हो चुका है इसीलिये जो विकल्प मेरे जेहन में उभर कर आये, वो थे हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड।

ऑफिस के काम से एक बार शिमला जाना हुआ था पर घूमने का ज्यादा मौका नहीं मिल पाया था और जब श्रीमती जी ने भी शिमला और मनाली जाने की इच्छा प्रकट की  तो हमने इस बार देव भूमि हिमाचल प्रदेश को एक्स्प्लोर करने का मन बना लिया। यूँ तो हिमाचल का हरेक हिस्सा (चाहे वो धर्मशाला हो या फिर मैकलॉयडगंज, केलोंग हो या फिर किन्नौर)  एक से बढ़ कर एक है और अपने आप में एक टूरिस्ट स्पॉट है पर हमने इस बार के ट्रिप में कुल्लू, मनाली एवं शिमला को शामिल किया। मनाली जाने के क्रम में चंडीगढ़ में भी एक रात बिताने की योजना थी।

सफर की सारी तैयारियों के बाद मई के दूसरे हफ्ते में हमलोग अपने गन्तव्य की ओर निकल पड़े। राजधानी एक्सप्रेस से पटना  से दिल्ली तक का रात भर का सफर काफी आरामदायक रहा और ट्रेन अपनी ख्याति के अनुरूप बिलकुल सही समय पर नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँच चुकी थी।  यूँ तो मनाली के लिए दिल्ली से भी डायरेक्ट बस सेवा उपलब्ध है पर १२ घंटों  से भी ज्यादा बस के लगातार सफर का आईडिया हमें कुछ जमा नहीं। कुछ तो पहाड़ी रास्तों की उबड़-खाबड़  और कुछ हरियाना रोडवेज के चालकों की सिद्धहस्तता के बारे में सुन रखी कहानियों ने मुझे भयाक्रांत कर दिया था।  तय ये हुआ कि दिल्ली से चंडीगढ़ बस से पहुँचा जाये और फिर वहीं रात बिता कर अगली सुबह चंडीगढ़ से मनाली और शिमला का सफर टैक्सी से किया जाये। प्लान  के मुताबिक़ हमने दिल्ली से चंडीगढ़ केलिए वॉल्वो बस की टिकटें हरियाना रोडवेज की वेबसाइट (http://hartrans.gov.in/ors/) से ऑनलाइन बुक कर रखी थी और  चंडीगढ़ से आगे के पूरे सफर केलिए टैक्सी भी बुक कर लिया था।

दिल्ली के आईएसबीटी बस अड्डे से सुबह १०:२० बजे की बस से हमलोग चंडीगढ़ चल पड़े थे। दिल्ली-चंडीगढ़ उच्चमार्ग जिसे भारत की सबसे बेहतरीन सड़कों में एक माना जा सकता है, पर हमारी बस पानीपत और करनाल के रास्ते सरपट दौड़ लगा रही थी। करीब दो घंटे के सफर के बाद हमारी बस करनाल में एक रेस्तरां के पास 15 - 20 मिनट तक रुकी। रेस्तरां से थोड़ी ही दूर पर हमें एक सुन्दर सी झील दिखी और झील की तरफ हमारे कदम खुद- बखुद बढ़ गए।

करना झील 
लंबे सफर के बाद झील के पास थोड़ा समय बिताना एक सुखद एहसास था और हमलोग झील की खूबसूरती को निहारने में इतने मशरूफ हो गए थे कि बस के हॉर्न की आवाज़ भी सुनाई नहीं पड़ रही थी। आखिरकार बस कंडक्टर की तेज आवाज़ से हमें अचानक महसूस हुआ कि हमलोग अल्प विराम के लिए यहाँ रुके थे और अच्छा खासा वक़्त बीत चुका है। भागते हुए हमलोग बस में चढ़े और कंडक्टर ने हमें जब घूर के देखा तो पता चला बाकी सारे लोग बस में बैठ चुके थे और केवल हमदोनों के इंतज़ार में बस रुकी थी।

करीब २ बजे तक हमलोग अम्बाला और जिरकपुर होते हुए चंडीगढ़ पहुँच चुके थे। चंडीगढ़ के बारे में जैसा सुन रखा था, हू-बहू वैसा ही पाया - सुनियोजित, सुन्दर और शालीन। मोहाली के बाद जब सड़कें और ज्यादा चौड़ी और सुन्दर हो जाती हैं और गाड़ियाँ अनुशासित हो चलने लगती हैं तो यह समझते देर नहीं लगती कि आप चंडीगढ़ में प्रवेश कर चुके हैं।
Image courtesy: yourstory.com

शहर पहुँचने के बाद हमलोग मनिमाजरा स्थित गेस्टहॉउस चले गए।  हमारे पास चंडीगढ़ घूमने के लिए शाम तक का समय था , क्योंकि अगली सुबह हमें मनाली की ओर जो कूच करना था।

मनाली के बारे में विस्तार से अगले अंक में बताने का प्रयास होगा।  तब तक के लिए अलविदा।  

Friday, 10 June 2016

A Trip to Zuluk, East Sikkim



Nature has bestowed upon us bountiful natural beauties in the form of gigantic snow caped mountains, fast flowing rivers, serene lakes and springs so on and on. Our country has been richly endowed with wide and diverse ranges of flora and fauna and other natural formations.

Several tourist places of Eastern Himalaya has been covered in my articles so far. Today, I would like to introduce before my readers and fellow travellers, Zuluk, a relatively lesser known place in Eastern Himalayas, which is slowly gaining popularity due to it’s prominent location and magnificent views.
Located at a height of around 10,100 feet on the rugged terrain of the lower Himalayas in East Sikkim, Zuluk offers excellent view of Himalayan ranges. Zuluk, located at erstwhile historical silk route between Kalimpong, India and Lhasa, Tibet used to be base for traders coming from Tibet for their night stay. After Chinese aggression in Tibet, the silk route connecting Tibet with India through Jelep-la has been closed and now the tiny village is used as a base by travellers going to Kupup, Jelep-La and Tsomgo Lake. In the last few years, Zuluk itself has risen into prominence as a scenic tourist spot due to it’s numerous hairpin bends in the road leading up to the village and spectacular views from the hilltop.
The Silk Route leading to Zuluk
On one weekend, we started from Gangtok to Zuluk via Pakyong, Rongli & Padamchen. Though there is another route from Gangtok via Bhusuk, Tsomgo Lake & Sherethang, which is shorter, we chose the other one, as we had to visit Aritar Lake too. Aritar lake is a major picnic spot for locals and tourists of neighbouring state West Bengal. 
Aritar Lake
One can spend entire day around the lake by indulging in range of fun activities like boating and trekking up to the Shiva temple at the hilltop.

Do Hanson ka Joda
Flowers around the lake
We spent some time at the lake and refreshed ourselves having tolerated travelling on patchy roads for around 2 hours, then proceeded for our destination. We had crossed Rongli by 1:00 PM and after half an hour drive from Rongli, our vehicle started moving up on a never-ending serpentine hilly road with numerous hairpin bends. There are about 32 hairpin bends on the route, which makes this road an engineering marvel. As we were inching towards Nathang Valley, Army camp was before our sight. The major chunk of land of zuluk village is under Army's control. By 02:15 PM, we had reached Zuluk, but we did nit stop there, as for the best views of the Eastern Himalayan ranges, we had to reach Thambi view point, which was another half an hour away. Though it was a sunny day, but after reaching Thambi View Point, weather had changed it's colour and we had started looking for additional warm cloths, which we were carrying anticipating the turbulent mood of weather in mountains. Snow was increasingly visible on the mountains, as we were moving ahead and after some time, our vehicle had started moving with a snail's pace on a snow-covered road.
Scenic View as seen from Thambi View Point
 After having some photographs at view point, we proceeded towards Kupup Lake. 
Snow was increasingly visible on the nearby mountains, as we were moving ahead and after some time, our vehicle had started moving with a snail's pace on a snow-covered road. The panoramic lake surrounded by snow laden hills was before our eyes with all it's magnificence and grandeur.
Kupup Lake




We had chosen another route for our return to Gangtok via sherethang and Tsomgo Lake, to which we all were familiar due to our frequent visit to Nathu-la pass. By 6:00 PM or so, we had reached back home at Gangtok.

How to reach Zuluk:
For those coming from various parts of the world, Zuluk can be reached from Siliguri, West Bengal covering a distance of around 150 Kms. Alternatively, you can also visit the place after reaching Gangtok. Inner Line Permit is required to be obtained even in case of Indian travellers for visiting Zuluk. Hotels are not available at Zuluk, however, one can stay in homestays being run by local villagers. For those preferring staying in a hotel, Padamchen, around 10 km before Zuluk offers more options.

Zuluk can be visited any time through out the year, however after rainy season, the route becomes more beautiful due to blossoming wild flowers covering entire valleys. Come, visit Zuluk. It won't disappoint you.

Thursday, 21 January 2016

Lamahatta : The countryside of Darzeeling



Chasing angels or fleeing demons, go to the mountains.”
- Jeffrey Rasley
Mountains are really a great place to unwind and discover one's inner self and if those mountains are none other than the Himalayas, the experience becomes heavenly. 

Friends! I am back with a new travel memoir about a new rather less known tourist place nestled in Eastern Himalayas, i.e. Lamahatta. Hope, you will find the place appealing enough to include it in your travel wishlist. There are many natural travel destinations in Eastern Himalayas, which are at their best, when there is no human intervention to keep their beauty and glory intact, however there are some places, which have been developed into a tourist spot, so that people can spend good quality time, while enjoying the company of their loved ones along with the lovely nature. Lamahatta is one such travel destination. The place was developed as tourist spot in 2012 by the local administration with the help of villagers at the behest of the Hon'ble chief minister of West Bengal.

The road-side mountain village falls in Gangtok to Darjeeling route and is at around an hour away from Darjeeling. Travelers on Darjeeling trip can plan for one night stay in home stays of Lamahatta. It can also be chosen as honeymoon destination. The scenic site offers something for everyone - breathtaking scenery, magical glimpse of Snow-caped mountain ranges, trekking, delicacy of food prepared by locals and a memorable night stay in tents and huts miles away from hustle and bustle of urban life.

The altitude of Lamahatta is lesser (5700 ft) than that of Darjeeling, however the temperature is almost the same, as the place is replete with greenery, surrounded by large number of dhupi and pine trees.

As we came to know about the place through a colleague, we decided to make it our next picnic destination. It was a 3 and 1/2 hours ride from Gangtok and by 11 AM, we had reached Lamahatta. After reaching there, we decided to find some good home stays for our night stay and keep our luggage there, so that we can roam around or go on trekking freely. There were around 15 rooms and some tents with total capacity of around 40 persons on one side of road. Each room had two beds and maximum 3 persons can be accomodated in one room. The rent for one room was around Rs. 800/- and for tent, it was little higher. We got settled in four rooms and took breakfast there. One special feature of Lamahatta may be the delicious and fresh food served by the locals. You will not get professional service, but will definitely feel the warmth in their hospitality. You will have to tell them in advance, what you want to have in your food.

After having breakfast, we started exploring the place and capture some good views of the manicured park located at the foothill. The garden has many seasonal flowering plants including orchids. There is an entry fee of Rs. 10/- for entering in the eco-tourism park.


View of Garden and trail of flags



Beautiful Hut with beautiful kids


Garden and Homestays at Lamahatta

There after, we decided to trek along 1.5 km long route to the sacred lake, situated at top of the hill. The trek offered some excellent photography opportunities, while walking in the woods.



Walking in the woods


Sacred Lake at the Hilltop
We had reached at the hill top with in 40 to 45 minutes and spent couple of hours there, enjoying the purity of the breeze blowing through the dense forests and purifying ourselves in the process. We started to climb down the hill, as it was getting dark and we had also started feeling hunger pangs.

After reaching our homestays, we had our lunch and then started planning for our evening with bonfire and music in the mountain village. The weather god was getting harsher on us , as the chilly evening was engulfing the village. The temperature must have fallen to 2 or 3 degree celsius on that december night. Now, it was time to show some resistance to the biting cold and we had prepared well. 

Soon, we were all sitting in the open surrounding the bonfire set by us and then started the round of our musical talent in the form of Antakshari. It was indeed very enjoyable and the tranquility of the sleeping mountain unperturbed by the sound of gushing river nearby added to our amazing experience. Our musical night had turned into a magical night. Our tryst with fierce winter night came to an end with the announcement of dinner time by the cook of the home stay. With the fire surrendering to the might of freezing cold and our stock of songs getting scarce, we decided to call it a day. We had our dinner and then rushed to our beds to cover ourselves with blankets and quilts to fight the punishing cold.


In the morning, we were greeted by the sunshine and a clear view of Snow-caped peaks of Mt. Kanchendzonga. With this, our trip was really complete and memorable.



Mt. Kanchendzonga ranges as seen from Lamahatta

Please do share your experiences, if you have been to Lamahatta or any other lesser known tourist places in India.


  

Sunday, 19 July 2015

Darjeeling Trip: Toy Trains to Tea Estates



Any trip to Darjeeling can not be considered complete without visiting it's tea estates, for which the place is renowned all over the world. The heritage toy trains are also a major tourist attraction of Darjeeling. The scenery, that unfolds before your eyes, while taking a ride in the toy train, can be a surreal experience. During my trip, i had the opportunity to explore these two famous T's of Darjeeling, i.e. Tea Estates and Toy Train.

Tea Estates

As we all know, Darjeeling is one of the largest producer of premium tea in the world and the place reaches to all Indian homes through the rich aroma of tea produced here. While having Darjeeling tea sitting at your home may be a stimulating experience, a stroll through the tea gardens and interaction with tea workers may also be a memorable one. 



Tea Garden at Mirik, Darjeeling


There are many tea estates in Darjeeling area and some of them were established in the post-independence era by our colonial cousins. In fact the tea plantation was introduced in this area by the Britishers only. One can visit these gardens after taking permission from the manager of estate. Some tea estates in Darjeeling area also offer vacation packages to tourists to experience life in the gardens along with stays in heritage bungalows, plus musical and cultural activities that are rarely found anywhere else in the world. 

Some of the most renowned tea estates are : Makaibari, Glenberg, Happy Valley, Singtom and Gomtee.

Toy Trains

Apart from the tea gardens, Darjeeling has one more major tourist attraction, which finds it's place in the wishlist of each tourist travelling to the hill station, i.e. the toy trains of Darjeeling Himalayan Railway (DHR). It has been accorded UNESCO World Heritage status due to engineering acumen and creative skills employed in it's construction, making it the 2nd Railway in the world to receive such status. The toy trains are also the legacy of the British rule. Operating on narrow gauge tracks since 1880s, these steam engine toy trains offer unique ride through breath-taking landscapes, picturesque mountains, villages and shops on the way with children waving at you. 

Though DHR operates toy trains between New Jalpaiguri and Darjeeling covering total distance of around 80 kms, the most preferred section by the tourists is Ghum (the highest railway station of Asia) to Darjeeling, a 7 km long track. The train moves along the hilly terrain with snail's pace, taking around 2 hours to complete 14 km journey from Ghum to Darjeeling and back. The train operates 04 times a day between Ghum & Darjeeling. One advice for travelers wishing to board these joyride trains - Please book your tickets in advance, as you may not get it over the counter due to heavy rush of tourists.  Online Ticket booking may be made through the website of IRCTC.

Tourists, while reaching Darjeeling city by road, can see the toy train running parallel to the Hill kart road and climbing up to the famous Batasia loop. 



It stops here for 10 minutes giving the tourists opportunity to capture the magnificent views of Darjeeling town and snow caped ranges of Mt. Kanchandzonga. Batasia loop has itself been developed as a tourist place with manicured garden and a war memorial at the centre.


Toy Train near Batasia Loop

View of Mt. Kanchandzonga from Batasia Loop

Joyride Train 

View of Darjeeling Town from Batasia Loop

War Memorial built in the honor of Gorkha Soldiers
The place has been picturized in many Hindi and Bangla movies and the most notable of them is the song "Mere Sapno Ki Rani" from the movie Aaradhana picturized on the superstar Rajesh Khanna, Sharmila Tagore and Sujeet Kumar. You can compare the Batasia loop of 1969 (the year, Aaaradhana released) and now. I will leave you with the melodious and evergreen tune of the legendary music composer S D Burman. Enjoy!




Sunday, 21 June 2015

यात्रा और यात्री (Travel and Traveler)




 साँस चलती है तुझे
 चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता,
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता,
                 पाँव के नीचे पड़ी
                 अचला नहीं, यह चंचला है,
एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता,
                 शक्तियाँ गति की तुझे
                 सब ओर से घेरे हुए है;
                 स्थान से अपने तुझे
                 टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!
         साँस चलती है तुझे
         चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!




थे जहाँ पर गर्त पैरों
को ज़माना ही पड़ा था,
पत्थरों से पाँव के
छाले छिलाना ही पड़ा था,
                 घास मखमल-सी जहाँ थी
                 मन गया था लोट सहसा,
थी घनी छाया जहाँ पर
तन जुड़ाना ही पड़ा था,
                 पग परीक्षा, पग प्रलोभन
                 ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू
                 इस तरफ डटना उधर
                 ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
         साँस चलती है तुझे
         चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते,
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते,
                 शुक्रिया उनका कि वे
                 पथ को रहे प्रेरक बनाए,
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने
के लिए मजबूर करते,
                 और जो उत्साह का
                 देते कलेजा चीर, ऐसे
                 कंटकों का दल तुझे
                 दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
         साँस चलती है तुझे
         चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चंद्रमा ने मुस्कुराना,
और भूली यामिनी भी
तारिकाओं को जगाना,
                 एक झोंके ने बुझाया
                 हाथ का भी दीप लेकिन
मत बना इसको पथिक तू
बैठ जाने का बहाना,
                 एक कोने में हृदय के
                 आग तेरे जग रही है,
                 देखने को मग तुझे
                 जलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
         साँस चलती है तुझे
         चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!


वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है,
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है;
                 यह मनुज की वीरता है
                 या कि उसकी बेहयाई,
साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है
                 सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
                 स्वप्न, पर चलना अगर है,
                 झूठ से सच को तुझे
                 छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
         साँस चलती है तुझे
         चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
                    
                                      - हरिवंश राय बच्चन 
 

The Road not taken!




TWO roads diverged in a yellow wood, 
And sorry I could not travel both 
And be one traveler, long I stood 
And looked down one as far as I could 
To where it bent in the undergrowth; 

Then took the other, as just as fair, 
And having perhaps the better claim 
Because it was grassy and wanted wear; 
Though as for that, the passing there 
Had worn them really about the same, 

And both that morning equally lay 
In leaves no step had trodden black.
 
Oh, I marked the first for another day! 
Yet knowing how way leads on to way 
I doubted if I should ever come back.
 


I shall be telling this with a sigh 
Somewhere ages and ages hence: 
Two roads diverged in a wood, and I, 
I took the one less traveled by, 
And that has made all the difference.

                                          - Robert Frost